संस्थान में लंबे समय से कार्यरत कुछ अस्थायी कर्मचारियों को बाहर किए जाने का मुद्दा भी अब चर्चा में है। जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि करीब एक दशक से संस्थान में सेवाएं दे रहे कुछ अस्थायी कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद संस्थान की कार्यप्रणाली और कर्मचारियों से जुड़े फैसलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

अस्थायी कर्मचारियों को हटाने पर जताई नाराजगी
जनप्रतिनिधियों के अनुसार, संस्थान में कई वर्षों से काम कर रहे कुछ अस्थायी कर्मचारियों को बाहर किए जाने से स्थानीय स्तर पर असंतोष है। उनका कहना है कि कर्मचारियों से जुड़े निर्णयों और संस्थान की कार्यप्रणाली के संबंध में स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
इस मामले में जनप्रतिनिधियों ने प्रशासन से हस्तक्षेप करने और संस्थान के कामकाज की जांच कराने की मांग की है। हालांकि, कर्मचारियों को हटाने के पीछे संस्थान की ओर से क्या कारण बताए गए हैं, इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।
राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत अनियमितताओं के आरोप
मामले ने उस समय और तूल पकड़ लिया, जब संस्थान से पहले बाहर किए गए कर्मचारियों ने राष्ट्रीय हिमालयी अध्ययन मिशन के तहत कथित अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को भी ज्ञापन भेजा।
कर्मचारियों की ओर से उठाए गए इन आरोपों के बाद अनुसंधान परियोजनाओं के संचालन, उनके खर्च और हासिल की गई उपलब्धियों की पारदर्शिता का मुद्दा सामने आया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और न ही जांच के निष्कर्षों की जानकारी उपलब्ध है।
जनप्रतिनिधियों की मांग है कि संस्थान में संचालित अनुसंधान कार्यों पर खर्च की गई धनराशि और उनसे प्राप्त उपलब्धियों का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि संस्थान की गतिविधियों का आकलन तथ्यों के आधार पर किया जा सके।
कई जनप्रतिनिधियों ने सौंपा ज्ञापन
संस्थान की कार्यप्रणाली की जांच और पारदर्शिता की मांग को लेकर ज्ञापन भेजने वालों में विभिन्न क्षेत्रों के जनप्रतिनिधि शामिल हैं। इनमें मटेला के पूर्व प्रधान मनोज, प्रधान भावना बिष्ट, जिला पंचायत सदस्य पूजा ढौरा, जिला पंचायत सदस्य प्रेम लटवाल, खत्याड़ी की जिला पंचायत सदस्य ममता कनवाल, ढौरा की प्रधान ममता फत्र्याल और स्याली के क्षेत्र पंचायत सदस्य भूपेंद्र आर्या शामिल हैं।
इसके अलावा लाट, लमगड़ा सहित अन्य क्षेत्रों के जनप्रतिनिधियों ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता जताई है। उन्होंने संस्थान के कामकाज की जांच कर आवश्यक तथ्यों को सामने लाने और संबंधित मामलों में उचित कार्रवाई करने की मांग की है।
जांच और पारदर्शिता को लेकर बढ़ी मांग
गोविंद बल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान हिमालयी पर्यावरण, पारिस्थितिकी और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अनुसंधान कार्यों के लिए जाना जाता है। ऐसे में संस्थान के कामकाज, अनुसंधान संबंधी खर्च और परियोजनाओं की उपलब्धियों को लेकर उठे सवालों के बीच पारदर्शिता की मांग महत्वपूर्ण हो गई है।
फिलहाल, जनप्रतिनिधियों और पूर्व कर्मचारियों की ओर से लगाए गए आरोपों पर संस्थान का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है। जांच की मांग पर प्रशासन या संबंधित विभाग की ओर से क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ज्ञापन के आधार पर जांच की प्रक्रिया शुरू होती है या नहीं और संस्थान की कार्यप्रणाली से जुड़े सवालों पर संबंधित अधिकारी क्या स्पष्टीकरण देते हैं।
