हरिद्वार: ऑनलाइन फूड डिलीवरी में 10 इंच का पिज्जा ऑर्डर करने वाले ग्राहक को 7 इंच का पिज्जा देना कंपनी और कैफे को भारी पड़ गया। शिकायत के बावजूद रिफंड नहीं करने के मामले में हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग ने सख्त रुख अपनाते हुए उपभोक्ता के पक्ष में फैसला सुनाया है। आयोग ने संबंधित पक्षों को पिज्जा की कीमत और डिलीवरी चार्ज लौटाने के साथ मानसिक क्षतिपूर्ति और वाद व्यय का भुगतान करने का आदेश दिया है।

10 इंच के बजाय मिला 7 इंच का पिज्जा
मामला ऑनलाइन पिज्जा ऑर्डर से जुड़ा है। उपभोक्ता ने 10 इंच का पिज्जा ऑर्डर किया था, लेकिन डिलीवरी के बाद उसे महज 7 इंच का पिज्जा मिला। ग्राहक ने कंपनी और संबंधित कैफे से शिकायत करते हुए रिफंड की मांग की, लेकिन शिकायत का समाधान नहीं किया गया।
राहत नहीं मिलने पर उपभोक्ता ने राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन में शिकायत दर्ज कराई। इसके साथ ही संबंधित पक्षों को कानूनी नोटिस भी भेजा गया। जब इसके बाद भी समस्या का समाधान नहीं हुआ तो उपभोक्ता ने जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने खुद को बताया मध्यस्थ
मामले की सुनवाई के दौरान ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म की ओर से तर्क दिया गया कि उसकी भूमिका केवल ग्राहक और कैफे के बीच मध्यस्थ की है। प्लेटफॉर्म ने पिज्जा के साइज और गुणवत्ता की जिम्मेदारी से खुद को अलग बताया।
हालांकि आयोग ने इस दलील को खारिज कर दिया। अध्यक्ष गगन कुमार गुप्ता, सदस्य डॉ. अमरेश रावत और रंजना गोयल की पीठ ने मामले में उपभोक्ता को राहत देने का आदेश जारी किया।
10,525 रुपये का भुगतान करने का आदेश
आयोग ने संबंधित पक्षों को उपभोक्ता को 505 रुपये पिज्जा की कीमत, 15 रुपये डिलीवरी चार्ज, 5,000 रुपये मानसिक क्षतिपूर्ति और 5,000 रुपये वाद व्यय के रूप में देने का आदेश दिया है।
इस तरह कुल 10,525 रुपये का भुगतान करना होगा। आयोग ने यह राशि 45 दिनों के भीतर अदा करने के निर्देश दिए हैं। तय समय में भुगतान नहीं करने पर बकाया राशि पर 10 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।
ऑनलाइन फूड डिलीवरी कंपनियों की जवाबदेही पर सवाल
यह फैसला ऑनलाइन फूड डिलीवरी से जुड़े उपभोक्ता अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामले में ग्राहक को ऑर्डर किए गए उत्पाद से अलग और कम साइज का पिज्जा मिला, जबकि शिकायत के बाद भी उसे उचित समाधान नहीं मिला।
आयोग के आदेश ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और संबंधित विक्रेताओं की जवाबदेही को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उपभोक्ता के लिए यह मामला इस बात का उदाहरण है कि ऑनलाइन ऑर्डर में गड़बड़ी होने और शिकायत का समाधान नहीं मिलने पर उपभोक्ता आयोग का रुख किया जा सकता है।
